Mobin And Another Vs Dy. Director Of Consolidation And 6 Others

Allahabad High Court 9 Nov 2023 Writ - B No. - 2526 Of 2023 (2023) 11 AHC CK 0020
Bench: Single Bench
Result Published
Acts Referenced

Judgement Snapshot

Case Number

Writ - B No. - 2526 Of 2023

Hon'ble Bench

Saurabh Shyam Shamshery, J

Advocates

Onkar Singh, Abhitab Kumar Tiwari

Final Decision

Dismissed

Acts Referred
  • Constitution Of India, 1950 - Article 226
  • U.P. Consolidation of Holdings Act, 1953 - Section 9A(2)
  • U.P. Zamindari Abolition and Land Reforms Act, 1950 - Section 171
  • Evidence Act, 1872 - Section 112

Judgement Text

Translate:

Saurabh Shyam Shamshery, J

1. This case is arising out of a proceedings initiated under Section 9A(2) of U.P. Consolidation of Holdings Act, 1953 (hereinafter referred to as “Act, 1953”).

2. Parties have not disputed the pedigree so far as relations are concerned that land in dispute was in the name of Yaqoob, who has three sons, namely, Shakeel, Jameel and Furkan. The eldest son Shakeel had married with Petitioner-1, Smt. Mobin on 01.03.1997. However, unfortunately he died on 27.07.1997. It is the case of Petitioner-1 that out of wedlock of Shakeel a daughter was born (Petitioner-2 herein) whereas case of contesting-respondents is that Petitioner-1, after death of her husband, remarried and Petitioner-2 was born out of wedlock with her second husband. It is further case of contesting-respondents that since Petitioner-1 has not taken care of her husband during his life time, therefore, he executed a Will dated 12.07.1997 in favour of contesting-respondents, i.e., his two brothers.

3. Petitioners have lost before all the three authorities, i.e., Consolidation Officer, Settlement Officer of Consolidation and Deputy Director of Consolidation. Relevant part of impugned orders are mentioned hereinafter:

Order dated 12.04.2022 passed by Consolidation Officer

“ उभय पक्षों के योग्य अधिवक्तागणों को सुनने और पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्य का अवलोकन करने से स्पष्ट है कि विवादित आराजी में फुरकान व जमील अहमद पुत्रगण याकूब के नाम वर्तमान खतौनी में दर्ज है जो न्यायालय तहसीलदार मवाना के आदेश दिनांक 25.01.2001 के आधार पर ही दर्ज है। न्यायालय मौबीन के योग्य अधिवक्ता के इस तर्क से सहमत है कि धारा 34 राजस्व अधि0 के अन्तर्गत हुई कार्यवाही एक सरसरी कार्यवाही है। धारा 34 राजस्व अधि० के अऩ्तर्गत स्वत्व का निर्धारण नहीं होता। न्यायालय नोबीन के यौग्य अधिवक्ता के इस कथन से सहमत है कि शकील मृत्यु / हत्या के समय एक और व्यक्ति था और शकील के द्वारा कथित कृत वसीयत दिनांक 12.07.1997 शंकाओं से मुक्त नहीं है लेकिन आदेश दिनांक 25.01.2001 के निर्णय में स्पष्ट रूप से उल्लेखित है कि मोबीन ने अपनी आपित्त न्यायालय तहसीलदार मवाना वाद सं0 356 धारा 34 के अऩ्तर्गत वसीयत दिनांक 12.07.1997 के आधार पर फुरकान व जमील का नाम दर्ज किये जाने पर सहमति व्यक्त की और लगभग 20 वर्ष तक आदेश दिनांक 25. 01.2001 के विरुद्ध किसी भी न्यायालय में अपने हक का प्रश्न न उठाना इस बात को बल देता है कि तत्समय उसने न्यायालय तहसीलदार मवाना में आदेश दिनांक 25.01.2001 पारित करने पर सहमति दी लेकिन विधिक रूप से तथ्य निश्चित है कि आदेश दिनांक 25.01.2001 धारा 34 सरसरी कार्यवाही के अऩ्तर्गत आता है जो मोबीन पर बन्धनकारी प्रभाव नही रखता है। तदानुसार उक्त बाद बिन्दु निस्तारित किये जाने योग्य है।

वाद सं0 बिन्दु 2+3 मोबीन के योग्य अधिवक्ता द्वारा कथन किया गया कि मृतक शकील अहमद की पत्नी विधिक आधार पर होने पर मोबीन विरासतन हक मृतक पाने की अधिकारी है और मोबीन का हक हड़पने के उद्देश्य से फुरकान आदि ने शकील अहमद की मृत्योपरान्त एक फर्जी अपंजीकृत वसीयत तैयार करके अपने नाम उक्त विवादित आराजी में दर्ज करा लिये इसलिए आदेश दिनांक 25.01.2001 को शून्य मानते हुए फुरकान आदि के साथ मोबीन का नाम बतौर सहखातेदार दर्ज किया जाये। जवाब में फुरकान के योग्य अधिवक्ता द्वारा कथन किया गया कि शकील अहमद की मृत्यु के उपरान्त मोबीन ने सलीम पुत्र अब्दुल वहीद निवासी खतौली मुजफ्फनगर के साथ निकाह करने के साथ ही शकील की विरासत पाने का हक खो दिया और सलीम के निकाह से मोबिन को दो सन्ताने पैदा हुई, इसलिए मोबीन की मांग निराधार व बलहीन है खारिज की जाये।

पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्य का अवलोकन करने व उभय पक्ष अधिवक्तागण बहस मे दिये गये तर्कों को सुनने से स्पष्ट है कि मोबीन ने सलीम के साथ निकाह किया जाना अपने व्यानो में स्वीकार किया है। पक्ष प्रतिपक्ष दोनो की ओर से मोबीन का आधार कार्ड की छायाप्रति प्रस्तुत की गयी है। जिसमें उसके पति का नाम सलीम भलीभांति अंकित है साथ ही उभय पक्षों ने उक्त तथ्यों को अपने-अपने ब्यान/ जिरह में भलीभांति स्वीकार किया है। यह भी तथ्य साक्ष्यों के संज्ञान से आया है कि मोबीन ने द्वितीय पति सलीम की मृत्यु के उपरान्त तीसरा निकाह / विवाह भी किया है। खुद जिरह में मोबीन ने इस तथ्य को स्वीकार किया है। इस प्रकार बहस में सुने गये तर्कों व पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्य का अनुशीलन करने से स्पष्ट है कि मोबीन ने अपने प्रथम पति शकील की मृत्योपरान्त सलीम पुत्र अब्दुल वहीद नि० खतौली मुजफ्फरनगर के साथ पुनः निकाह किया और सलीम की मृत्यु के बाद मोबीन ने तीसरा निकाह भी किया है और यह विधिक रूप से सुनिश्चित है कि पति की मृत्योपरान्त पुनः निकाह करने पर प्रथम पति की विरासत के आधार पर उसकी सम्पत्ति (कृषित भूमि) में हक पाने का अधिकार नही रह जाता है जेड०ए०एल०आर० एक्ट 1950 की धारा 171 जिसके आधार पर मोबीन उसके प्रथम पति शकील की सम्पत्ति उक्त विवादित आराजी कृषि भूमि में हक पाने की अधिकारी नही है क्योकि द्वितीय निकाह विवाह करने के बाद मोबीन के पति का नाम शकील अहमद नही रह गया है बल्कि उसके पति का नाम सलीम है और सलीम की पत्नि मोबीन का प्रथम पति शकील की विरासत पाने का अधिकारी नहीं है। तदानुसार उक्त वाद बिन्दु निस्तारित किये जाने योग्य है।

बिन्दु सं0 4- मोबीन के योग्य अधिवक्ता द्वारा कथन किया गया कि शकील अहमद व मोबीन एकमात्र सन्तान नाजमीन अपने पिता की सम्पत्ति में विरासतन हक पाने की अधिकारी है। योग्य अधिवक्ता द्वारा आगे कथन किया गया कि नाजमीन की हाईस्कूल की परीक्षा 2013 की मार्कशीट में उसके पिता का नाम शकील अहमद व माता नाम मोबीन अंकित है और नाजमीन के आधार कार्ड में भी उसके पिता का नाम शकील अंकित है, के आधार पर शकील की विरासत के आधार पर उक्त विवादित आराजी में नाजमीन पुत्री का नाम दर्ज किया जाये। जवाब में फुरकान आदि के योग्य अधिवक्ता द्वारा कथन किया गया कि जमीन की मार्कशीट हाईस्कूल परीक्षा 2013 में उसके पिता का नाम शकील अहमद अंकित है लेकिन उसकी जन्मतिथि 04.05.1999 अंकित है और शकील की मृत्यु होने का दिनांक 27.07.1997 हुई है जबकि पति की मृत्योपरान्त 280 दिन में जन्म लेने वाला बच्चा मृतक पिता का वारिस होने का प्राविधान विधिक रूप से है जबकि नाजमीन के कथित पिता शकील अहमद की मृत्यु के 600 दिन से भी अधिक बाद की जन्मतिथि उसकी हाईस्कूल की मार्कशीट में अंकित है। इस प्रकार नाजमीन मृतक शकील की पुत्री नहीं है। योग्य अधिवक्ता द्वारा आगे कथन किया गया कि आधार कार्ड में अंकित तिथि मोबीन ने जानबूझकर साक्ष्य तैयार करने के उद्देश्य से कम अंकित करायी है जो स्वीकार नहीं की जा सकती निराधार साक्ष्य है इसलिए मोबीन की मांग बाबत नाजमीन के हक बाबत खारिज की जाये।

उभय पक्षों के योग्य अधिवक्ताओं के तर्कों को सुनने व पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्यों का अवलोकन करने से स्पष्ट है कि नाजमीन की हाईस्कूल की परीक्षा-2013 की मार्कशीट में नाजमीन की अंकित जन्मतिथि दिनांक 04.05.1999 जोकि कथित नाज़मीन के पिता शकील अहमद की मृत्यु दिनांक 27.07.1997 के आधार पर शकील की पुत्री विधिक रूप से होना प्रमाणित नही होता है। न्यायालय फुरकान आदि के योग्य अधिवक्ता के इस कथन से सहमत है कि पिता की मृत्यु के 280 दिन के अन्दर जन्मा बच्चा मृतक पिता का वारिस जायज रूप से स्वीकार किया जा सकता है जबकि नाजमीन उक्त प्राविधान के अन्तर्गत शकील की पुत्री सिद्ध नही होती है क्योंकि उसका जन्म शकील की मृत्यु के लगभग पौने दो वर्ष बाद होना सिद्ध है। इसके अलावा मोबीन द्वारा इस न्यायालय के समक्ष दिये गये अपने ब्यान में कथित शकील की पुत्री की उम्र 21 वर्ष बतायी है. के आधार पर भी राजस्व सहिंता में किये गये प्राविधान के अन्तर्गत शकील की पुत्री स्वीकार करने योग्य नहीं है, इसके अलावा नाजमीन बालिग है व शादीशुदा है और उसने कभी भी किसी भी न्यायालय में अपने हक का दावा नही किया है। इस न्यायालय में भी वह कभी हाजिर नही हुई है उसकी ओर से उसकी माँ मोबीन द्वारा ही उसके हक हेतु आपत्ति कर पैरवी की जा रही है जो इस तथ्य की पुष्टि करता है कि नाजमीन मृतक शकील की विरासत पाने में रूचिकर नही है क्योंकि वह उसकी जायज पुत्री नही है और इसलिए उसने अपने हक की पैरवी नहीं की है। इस प्रकार नाजमीन के हक की पैरवी हेतु मोबीन द्वारा की गयी आपत्ति निराधार व बलहीन होने के कारण खारिज किये जाने योग्य है।

बिन्दु सं0 5– मोबिन के योग्य अधिवक्ता द्वारा कथन किया गया कि मृतक शकील की पत्नी मोबीन व पुत्री नाजमीन विरासतन हक पाने की अधिकारी है। तहसीलदार मवाना द्वारा फुरकान आदि के हक में पारित आदेश दिनांक 25.01.2001 फर्जी वसीयत के आधार पर पारित है जो कायम रखने योग्य नहीं है और उसका कोई बन्धनकारी प्रभाव मोबीन आदि पर नहीं है जवाब में फुरकान आदि के योग्य अधिवक्ता द्वारा कथन किया गया कि मोबीन की सहमति से शकील द्वारा कृत वसीयत का दाखिल खारिज आदेश दिनांक 25.01.2001 पारित हुआ था इसलिए उसका बन्धनकारी प्रभाव मोबीन है। उस वाद में मोबीन ने तत्समय तहसीलदार मवाना में अपने हक की आपत्ति की थी और उसकी कथित पुत्री नाजमीन के हक बाबत कोई मॉंग तत्समय नहीं की है लेकिन अब शकील की पुत्री बताकर मोबीन ने इस न्यायालय में नाजमीन की ओर से आपत्ति की है वो पूरी तरह से निराधार है, फर्जी और झूठे साक्ष्यों पर आधारित है। न तो मोबीन और न नाजमीन का कोई हक मृतक शकील की विरासत में नही बनता है। फुरकान व जमील अहमद पुत्रगण याकूब मृतक शकील पुत्र याकूब के सगे भाई है इसलिए शकील की विरासत पाने का अधिकार फुरकान व जमील का ही है। योग्य अधिवक्ता द्वारा आगे कथन किया गया कि मृतक शकील का और कोई जायज वारिस नहीं है इसलिए मोबीन द्वारा अपने व नाजमीन के हक में की गई आपत्ति बलहीन व निराधार है, खारिज की जायें। उभय पक्षों के योग्य अधिवक्ता द्वारा दिये गये तर्कों को सुनने व पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्य का अनुशीलन करने से स्पष्ट है कि मोबीन ने न्यायालय तहसीलदार मवाना व सत्र न्यायालय दण्ड अधिकारी वाद सं0248 / 2017 धारा 302/34 आई०पी०सी० में प्रस्तुत शपथपत्र मय फोटो दिनांक 15.06.2017 में स्पष्ट रूप से उल्लेखित किया हैं कि शकील की मृत्यु के बाद मेरा निकाह मेरे घरवालों ने सलीम पुत्र के साथ कर दिया था जिससे दो बच्चे है। मेरे शौहर सलीम का इन्तकाल निकाह के 8 वर्ष बाद हो क्या था। यह शपथपत्र इस बात की पुष्टि करता है कि मोबीन ने शकील की मृत्यु के बाद सलीम के साथ निकाह किया जिससे उसको दो बच्चे पैदा हुए जिसके सम्बन्ध में मोबीन ने इस न्यायालय के समक्ष दिये गये व्यान जिरह में अपना एक पुत्र नाजिम व एक पुत्री नाजमीन का कथन किया है। नाजमीन की आयु 21 वर्ष बताते हुए शादीशुदा बताया है इस प्रकार मोबीन के ब्यान व शपथपत्र एक दूसरे के विरोधाभाषी है कि शपथ पत्र दिनांक 15.06.2017 में अपने दो बच्चे सलीम से बताती है जबकि इस न्यायालय के समक्ष दिये ब्यान दिनांक 29.09.2020 में अपने दो बच्चे बताते हुए एक लड़का नाज़िम सलीम से व एक लडकी शकील से पैदा हुए का ब्यान देती है। नाजमीन के सम्बन्ध में दिये गये विरोधाभाषी उक्त ब्यान / शपथपत्र व न्यायालय तहसीलदार मवाना द्वारा पारित आदेश दिनांक 25.01.2001 के बाद से दिनांक 10.06.2021 तक लगभग बीस वर्ष तक कही भी किसी भी न्यायालय में शकील की कथित पुत्री नाजमीन के हक का दावा नही किया जिससे इस बात को बल मिलता है कि मोबीन ने नाजमीन के हक के बाबत झूठे व मनगंढत साक्ष्य के आधार पर मृतक शकील की विरासत में हक का दावा किया है जो किसी भी तरह से स्वीकार किये जाने योग्य नही है। मृतक शकील के जायज वारिसों के रूप में हक पाने हेतु साक्ष्य प्रस्तुत करने में मोबीन / नाजमीन पूरी तरह असफल है उक्त दोनो शकील की विरासत में कोई हक पाने की अधिकारी पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्य आधार पर नहीं है। फुरकान और जमील अहमद शकील के सगे भाई है इसमें कोई दुविधा इस न्यायालय को नही है इसलिए मृतक शकील के वही जायज वारिस है और विरासतन हक पाने के अधिकारी है इस प्रकार फुरकान आदि की आपत्ति स्वीकार करते हुए मोबीन / नाजमीन की आपत्ति निराधार / बलहीन होने के कारण खारिज किये जाने योग्य है। तदा नुसार उक्त वादो में निर्मित सभी बाद बिन्दु निर्णित किये जाते हैं।”

Order dated 28.06.2022 passed by Settlement Officer of Consolidation

“सुनवाई के दौरान अपीलार्थीगण विद्वान अधिवक्ता द्वारा अपील में अंकित तथ्यों तथा विपक्ष की और से विद्वान अधिवक्ता द्वारा विपक्ष गण की आपत्ति में अंकित तथ्यों पर अपने-अपने तर्कों ने मुख्यतः प्रकाश डाला गया। अवर न्यायालय की पत्रावली के पृष्ठ संख्या-4 / 2 पर अंकित अपीलार्थिनी मीबिन पत्नी शकील द्वारा लिपिबद्ध कराये गये अपने बयान दिनांक 17.08.2020 के सम्बन्ध में विपक्षीगण फुरकान आदि द्वारा अपीलार्थिनी मौबिन से दिनांक 29.09.2020 को की गई जिरह के दौरान अपीलार्थिनी मोबिन द्वारा न्यायालय जिला एवं सत्र न्यायधीश मेरठ में मु० अपराध संख्या-248 सन् 2017 सरकार बनाम फुरकान आदि धारा 302 / 34 आई०पी०सी० में प्रस्तुत किये गये अपने शपथपत्र दिनांकित 15.06.2017 इस पर लगे अपने फोटो को तस्दीक करते हुए सम्बन्धित न्यायालय में दिया जाना तथा सलीम पुत्र वाहिद निवासी खतौली से दूसरा निकाह करना तथा उससे एक लड़का होना स्वीकार किया गया है. प्रश्नगत शपथपत्र की प्रमाणित प्रति पत्रावली पर उपलब्ध है, जिसमें उसके द्वारा अपना दोबारा निकाह सलीम से होने, सलीम से दो बच्चे होने तथा शकील की हत्या के बाद कभी भी ग्राम बिसाला न जाना और न ही बिसौला में अपना कोई सम्बन्ध होना अपीलार्थिनी नौबिन द्वारा स्वीकार किया गया है। अपीलार्थिनी द्वारा इस जिरह में तहसीलदार मवाना के यहां यद्यपि अपना कोई बयान दिये जाने से इन्कार किया गया है, किन्तु तहसीलदार मवाना के प्रश्नगत आदेश दिनांक 25.01.2001 की अवर न्यायालय की पत्रावली पर उपलब्ध छायाप्रति के अवलोकन से यह सुस्पष्ट है कि तहसीलदार मदा।। द्वारा प्रश्नगत आदेश दिनांक 25.01.2001 अपीलार्थिनी मौबिना सहित सभी पक्षों की सहमति के आधार पर पारित है। अपीलार्थिनी श्रीमती मोबिन द्वारा उक्त सझौतानामा तहसीलदार महाना के न्यायालय के किये जाने की पुष्टि में श्रीमती मौबिना द्वारा 10 रूपये के फोटोयुक्त स्टाम्प पेपर पर दी गयी रूपये 40 हजार प्राप्ति की नोटेरी रसीद दिनांकित 16.01.2001 तथा दिनांक 12.01.2001 को ही दहेज का सामान वापस प्राप्ति की रसीद और दिनांक 16.01.2001 को ही दहेज सामान वापसी प्राप्ति की दूसरी रसीद दाखिल की गयी है, जो 10-10 रूपये के स्टाम्प पेपरों पर 02 गवाहों तथा श्रीमती मोबिन के रसीदी टिकटो पर हस्ताक्षर युक्त है तथा नोटेरी से प्रमाणित कराई गई है। इससे स्पष्ट है कि तहसीलदार मवाना द्वारा पारित नामान्तरण आदेश अपीलार्थिनी मौबिन द्वारा किये गये समझौते के आधार पर पारित है तथा शकील की मृत्यु के उपरान्त श्रीमती मौबिन दूसरा निकाह कर लिये जाने के कारण, शकील की सम्पत्ति में उत्तराधिकारिणी नहीं रह गयी है। जहां तक अपीलार्थिनी संख्या-2 नाजमीन का मृतक शकील की पुत्री होने का तथ्य है, इसे साबित करने में भी अपीलार्थिनी मौबिन अवर न्यायालय में असमर्थ रही है। चकबन्दी अधिकारी द्वारा पारित आदेश दिनांक 12.04.2022 वाद में वाद बिन्दुओं को विरचित कर एवं उन पर पक्षों द्वारा प्रस्तुत किये गये समस्त साक्ष्यों की बिन्दुवार विवेचना करते हुए गुणदोष के आधार पर नियमानुसार पारित किया गया है, जिसमें किसी हस्ताक्षेप की आवश्यकता नहीं है। तद्नुसार अपील बलहीन होने के कारण निरस्त होने योग्य है।”

Order dated 13.04.2023 passed by Deputy Director of Consolidation

"मेरे द्वारा निगरानीकर्तागण की मौखिक बहस को विस्तार पूर्वक सुना गया। विपक्षीगण मौहम्मद फुरकान आदि की ओर से प्रस्तुत लिखित बहस, अन्य कागजात / साक्ष्यों का भी अवलोकन किया गया एवं निगरानी पत्रावली, अपीलीय न्यायालय की अपील पत्रावली तथा चकबन्दी अधिकारी, मेरठ के न्यायालय की बाद पत्रावली एवं उन पर पारित आदेश तथा अन्य उपलब्ध कागजातों का परीक्षण / परीशीलन किया गया। निगरानीकर्तागण की मौखिक बहस में उनके विद्वान अधिवक्ता द्वारा उन्ही तथ्यों / कथनों को दोहराया है, जो निगरानी मीमों में दर्शाये गये हैं तथा चकबन्दी अधिकारी मेरठ व बन्दोवस्त अधिकारी चकबन्दी मेरठ द्वारा क्रमशः आदेश दिनांक 12.04.2022 व 28.06.2022 को कूटरचित, फर्जी व मनमाना बताते हुए निरस्त करने की याचना की गई है तथा निगरानी स्वीकार करने पर बल दिया है।

इसके विपरीत विपक्षीगण फुरकान आदि की ओर से प्रस्तुत लिखित बहस जो साक्ष्यों सहित प्रस्तुत की गई है, में मुख्य रूप से उल्लेख किया गया है, कि प्रश्नगत सम्पत्ति में प्रतिपिक्षीगण संख्या 1 ता 2 की पैतृक भूमि में न्यागमन वर्णित शिजरा दर्शाया गया है, जिसके अनुसार याकूब के शकील, जमील व फुरकान पुत्र दर्शाये गये हैं। शकील की मृत्यु (27.08.1997) दर्शायी गई है। कथन किया है, कि प्रतिपक्षी के बड़े भाई शकील का निकाह दिनांक 01.03.1997 को मौबिना के साथ हुआ। मोबिना का शकील के प्रति व्यवहार सही नही था। दाम्पत्य अधिकार का निर्वाह न कर मौबिना निकाह के दो माह पश्चात अपनी मर्जी से अपने मायके रहने लगी। शकील द्वारा मोबिना को बार-बार बुलाने पर भी मोबिना अपने मायके से नहीं आई। शकील की सेवा शुश्रूषा प्रतिपक्षीगण जमील व फुरकान द्वारा की गई। इस सेवा भाव से खुश होकर शकील द्वारा अपने जीवन काल में अपनी इच्छा से एक इच्छा पत्र दिनांक 12.07.1997 का निष्पादन प्रतिपक्षीगण सगे भाईयों जमील व फुरकान के हक में किया। मृतक शकील के स्थान पर मोबिना ने राजस्व निरीक्षक से साज करके अपना नाम वारिसान के रूप में पक- 11क के आदेश दिनांक 15.12.1999 द्वारा माल कागजात में दर्ज कराया, जिसकी प्रविष्टि आधार वर्ष खतौनी 1404 ता 1409 फसली के खाता संख्या-282 पर अंकित है। उस समय तक नाजमीन अस्तित्व में रही थी। यह कि प्रतिपक्षी गण द्वारा आदेश दिनांक 15.12.1999 की प्रविष्टि के विरूद्ध शकील द्वारा इच्छापत्र दिनांक 12.07.1997 के आधर पर राजस्व अभिलेखों में अपना नाम कराने हेतु तहसीलदार मवाना के समक्ष नामान्तरण वाद संख्या-356 धारा 34- जेड़० एण्ड एल० आर० अधिनियम जमील अहमद बनाम शकील अहमद योजित किया, जिसमें निगरानीकर्ता मोबिना की ओर से आपत्ति प्रस्तुत की। उक्त कार्यवाही के दौरान मोबिना व प्रतिपक्षीगण फुरकान आदि के मध्य दिनांक 16.01.2001 को तस्दीक शुदा समझौतानामा एवं मोबिना द्वारा तस्दीक शुदा ब्यान के आधार पर तहसीलदार मवाना द्वारा राजस्व निरीक्षक पक- 11क में पारित आदेश दिनांक 15.12.1999 की प्रविष्टि निरस्त करके प्रश्नगत भूमि में शकील पुत्र याकूब मृतक के स्थान पर बतौर वसीयतदार प्रतिपक्षी जमील, फुरकान पुत्रगण याकूब नाम अभिलेख में दर्ज किये गये। उक्त आदेश दिनांक 25.01.2001 एक अन्तिम आदेश है, जिसके संज्ञान करने पर निगरानीकर्तागण द्वारा समय रहते हुए किसी भी राजस्व न्यायालय में चुनौती नहीं दी गई। निगरानीकर्ता एवं प्रतिपक्षीगण के मध्य न्यायालय तहसीलदार के समक्ष दिये गये तस्दीक शुदा समझौतानामा के आधार पर पारित समानान्तरण आदर्श के पश्चात 18 साल 10 माह 24 दिन बाद वर्तमान में पुनः उक्त लम्बित न्यायिक कार्यवाही भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा-33 (पूर्व कार्यवाहियों में किये गये कथन) धारा-58 (स्वीकृत तथ्यों की सुसंगति एवं स्वतः सिद्धि) धारा-115 (विबन्धन) के सिद्धान्तों से बाधित होने के कारण साथ-साथ सिविल प्रक्रिया की धारा-11 प्रायः न्याय (रसजूडीकेटा) के सिद्धान्त से बाधित होने के कारण लम्बित उक्त निगरानी खण्डित होने योग्य है। विपक्षीगण का लिखित बहस में यह भी तर्क रहा है कि निगरानीकर्तागण द्वारा शकील पुत्र याकूब की मृत्यु के बाद पुनः निकाह कर लिया, जिससे एक पुत्र एवं एक लड़की पैदा हुई। जिसकी स्वीकृति मोबिना द्वारा स्वयं न्यायालय जिला एवं सत्र न्यायाधीश मेरठ के समक्ष दिये गये फोटोशुदा शपथ पत्र दिनांक 15.06.2017 के साथ- साथ न्यायालय चकबन्दी अधिकारी मेरठ के समक्ष जिरह / प्रतिपरीक्षा दौरान दिनाक 29.09.2022 को दी गई। मोबिना द्वारा मौ० सलीम (द्वितीय पति) की मृत्यु के पश्चात शम नगर मेरठ के निवासी शबीर के साथ तीसरा विवाह किया, जिसकी पुष्टि मोबिना द्वारा चकबन्दी अधिकारी केरट की मूल पत्रावली में स्वयं द्वारा दाखिल उसके आधार कार्ड की फोटोप्रति में वर्णित पता से स्पष्ट होता है। वर्तमान में चौथा निकाह किया हुआ है, अपने पति शमीम के साथ श्याम नगर गली नं०-3 मेरठ में रहती है। जिसकी पुष्टि बैंक की पासबुक से होती है। इस प्रकार मोबिना का अपने पहले पति की मृत्यु उपरान्त पुनः निकाह करने के कारण मृतक शकील की वर्तमान में विरासतन के आधार पर उसकी कृषि भूमि में उ०प्र०जमीदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था अधिनिमय की धारा 171 अथवा उ०प्र० राजस्व संहिता 2006 की धारा 108 (1) के खण्ड (4) में वर्णित विधि-विधान के अनुसार कोई अंश प्राप्त करने की कानूनन अधिकारी नहीं है।

विपक्षीगण ने अपनी लिखित बहस में यह भी तर्क दिया है कि मृतक शकील एवं मोबिना के वैवाहिक संबंध से कोई संतान पैदा नहीं हुई। निगरानीकर्ता नाजमीन मृतक शकील की जैविक पुत्री नहीं है। उनका यह भी कथन है कि कु० नाजमीन के नाम की उ०प्र० माध्यमिक शिक्षा परिषद् हा० स्कूल परीक्षा-2013 की मार्कशीट में सनद अपने वाद - पत्र दिनांक 06.10.2021 के साथ प्रस्तुत की जिसमें कुछ नाजमीन की जन्मतिथि 04.05.1999 अंकित है, जबकि शकील पुत्र याकूब की मृत्यु दिनांक 27.08.1997 को हो चुकी है। शकील की मृत्यु के 01 वर्ष 08 माह 07 दिन अर्थात 615 दिन पश्चात नाजमीन का जन्म होना सभी कानूनी एवं चिकित्सा अवधारणाओं के परे शकील व मोबिना के वैवाहिक संसंर्ग से उत्पन्न संतान नहीं है। इस प्रकार निगरानीकर्तागण का प्रश्नगत सम्पत्ति में किसी भी प्रकार का कोई हित निहित नहीं हैं, मौके पर प्रतिपक्षीगण ही मालिक व काबिज चले आ रहे हैं। समस्त कागजात फर्जी एवं कूटरचित हैं। यह भी उल्लेख किया कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों द्वारा अपने विधि-विधान में हाईस्कूल प्रमाण पत्र में दर्ज जन्मतिथि को ही आयु निर्धारण में मान्य मानते हुए उम्र निर्धारित करने में आधार कार्ड को वैद्य दस्तावेज नही माना गया है। भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा-34 के अन्तर्गत निजी अभिलेखों शैक्षिक दस्तावेज में जन्मतिथि को ही प्रमाणित माना गया है। लिखित बहस में यह भी उल्लेख है कि चकबन्दी अधिकारी मेरठ व बन्दोबस्त अधिकारी चकबन्दी, मेरठ द्वारा उभयपक्षों को साक्ष्य व सुनवाई का अवसर देकर वाद बिन्दु बनाते हुए समस्त वाद बिन्दुओं की कानूनी रूप से विवेचना कर आदेश नियामनुसार गणु दोष के आधार पर पारित किये गये हैं, जिनको यथावत बहाल रखते हुए निगरानीकर्तागण द्वारा योजित निगरानी कानूनन अपोषणीय होने के कारण निरस्त होने योग्य है। अंत में कथन किया गया है कि झूठे मनगढ़ंत यों को दर्शित कर फर्जी कूटरचित अस्यपुष्टि दस्तावेजों की फोटोप्रति के साथ निगरानीकर्तागण द्वारा योजित निगरानी निराधार व बलहीन होने के कारण खण्डित करते हुए अधीनस्थ न्यायालयों क्रमशः चकबन्दी अधिकारी, मेरठ एवं बन्दोबस्त अधिकारी चकबन्दी, मेरठ द्वारा गुण-दोष पर पारित आदेशों को यथावत बहाल रखा जाये।

मेरे द्वारा विपक्षीगण फुरकान आदि की ओर से साक्ष्य के रूप में लिखित बहस में दर्शाये गये कथन के अनुसार फेहरिस्त सबूत 01 ता 18 पत्रावली पर प्रस्तुत किये गये है, का अध्ययन किया गया। इसके अतिरिक्त विपक्षीगण की ओर से अपने कथन की पुष्टि में मौहम्मद अब्दुल्ला आजम खान बनाम नवाब काजिम अली खान जे०एल०टी० (2022) एस०टी० जैड़ (सर्वोच्च न्यायालय), अंकित आदि बनाम उ० प्र० राज्य रिट-सी संख्या 10853 (202) (उच्च न्यायालय इलाहाबाद) एवं श्रीमती पार्वती कु० आदि बनाम उ० प्र० राज्य द्वारा सैकेट्री मि० बैंच नं० – 13419 / 2008 (उच्च न्यायालय इलाहाबाद बैंच लखनऊ) प्रस्तुत की हैं इन विधि व्यवस्थाओं में निगरानीकर्ता की ओर से प्रस्तुत निगरानी को निरस्त करने के कारण निहित प्रतीत होते हैं। निगरानीकर्ता श्रीमती मोबिना आदि की ओर से प्रस्तुत निगरानी मीमो एवं की गयी लिखित बहस एंव उनकी ओर से प्रस्तुत कागजातों आदि से यह स्पष्ट नही होता है, कि शकील की मृत्यु के बाद प्रश्नगत विवादित भूमि में उसका कोई अंश शेष रह गया हो और ना ही शकील के जीवनकाल में मोबिना से कोई संतान उत्पन्न हुई है, मोबिना द्वारा अपने जीवनकाल में अलग-अलग व्यक्तियों से विवाह/निकाह किये हैं। उनमे से किसी भी व्यक्ति द्वारा पैदा की गयी संतान का शकील की सम्पत्ति में कोई हक/सरोकार एवं वास्ता नही रह गया है क्योंकि याकूब की वंशावली के अनुसार उसके तीन पुत्र शकील, जमील व फुरकान हैं। शकील के कोई संतान नहीं थी वह अपने भाईयों के साथ रहता था। उनकी सेवा भाव से प्रसन्न होकर उसने उनके हक में अपनी सम्पत्ति की वसीयत की। चकबन्दी अधिकारी, मेरठ द्वारा पारित विस्तृत आदेश दिनांक 12.04.2022 एवं बन्दोबस्त अधिकारी चकबन्दी, मेरठ द्वारा पारित आदेश दिनांक 28.06.2022 वाद बिन्दु बनाते हुए पारित किये हैं। बाद से संबंधित पक्षों को विधिवत सुना गया है। तथा चकबन्दी अधिकारी ने अपने प्रश्नगत आदेश द्वारा विवादित आराजी से मृतक शकील की विरासतन हक के बाबत मोबिना / नाजमीन की आपत्ति निराधार एवं बलहीन मानते हुए खारिज की है। फुरकान आदि की आपत्ति स्वीकार करते हुए मृतक शकील के स्थान पर विरासतन फुरकान व जमील अहमद पुत्रगण याकूब दर्ज होने का आदेश पारित किया है। इसी आदेश के विरूद्ध अपीलीय न्यायालय मे श्रीमती मोबिना आदि द्वारा मौहम्मद फुरकान आदि को पक्ष मुकदमा बनाते हुये अपील सं० – 46 प्रस्तुत की। उक्त न्यायालय मे उभय पक्षों के तर्क सुनने, अपील पत्रावली एवं चकबन्दी अधिकारी की वाद पत्रावली पर पारित आदेश एवं प्रस्तुत साक्ष्यों का गहनता पूर्वक परिशीलन/अवलोकन करने के उपरांत अपीलकर्ता मोबिना आदि की अपील को चकबन्दी अधिकारी के आदेश को नियमानुसार उचित मानते हुये उसमे किसी हस्तक्षेप करने की आवश्यकता ना समझते हुये अपने आदेश दिनांक 28.06.22 द्वारा निरस्त किया गया है। उपरोक्तानुसार निगरानीकर्तागण मोबिना आदि की ओर से प्रस्तुत निगरानी मे कोई बल प्रतीत ना होने एवं चकबन्दी अधिकारी तथा बन्दोबस्त अधिकारी चकबन्दी, मेरठ द्वारा पारित आदेश तथ्यात्मक/विधियात्मक एवं जोत चकबन्दी अधिनियम मे प्रदत्त प्रावधानो के अनुरूप है, उऩमे किसी हस्तक्षेप/संशोधन की आवश्यकता नही रह जाती है। इसलिये प्रश्नगत निगरानी बलहीन एवं निराधार होने के कारण निरस्त होने योग्य है।"

4. Sri Onkar Singh, learned counsel for petitioners has not disputed above referred date of marriage of Petitioner-1 with Shakeel and date of his death. Learned counsel has vehemently urged that parentage of Petitioner-2 that she was born out of wedlock of Petitioner-1 and Shakeel was rejected on the basis of date of birth mentioned in her High School certificate, i.e., 04.05.1999 whereas date of death of Shakeel was 27.07.1997 and since there was a difference of 615 days between date of birth of Petitioner-2 and date of death of Shakeel, therefore, Shakeel could not be held father of Petitioner-2 without considering or disputing that in certificate parentage of Petitioner-2 is shown as Shakeel and Petitioner-1.

5. Learned counsel for petitioners further submitted that there were other documents on record wherein parentage of Petitioner-2 was shown to be daughter of Petitioner-1 and Shakeel, however, they were erroneously not considered. He further submitted that in order to verify the parentage of Petitioner-2, DNA test could be done and appropriate orders may be passed by this Court in this regard.

6. Aforesaid submissions are opposed by Sri Abhitab Kumar Tiwari, learned counsel appearing for contesting-respondents. He refers the provisions of Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Act, 2015 that with regard to determination of date of birth the educational certificate of High School is considered to be best evidence. He further submitted that order to conduct DNA test could not be passed in normal circumstances as well as that in terms of Section 171 of U.P. Zamindari Abolition and Land Reforms Act, 1950 Petitioner-1 could not be considered to be legal heir of Shakeel since admittedly she got remarried.

7. Heard learned counsel for parties and perused the material available on record.

8. This Court now proceed to consider first argument regarding determination of date of birth on basis of matriculation certificate. In this regard relevant paragraph of a judgment passed by Supreme Court in Sanjeev Kumar Gupta v. State of U.P., (2019) 12 SCC 370 is reproduced hereinafter:

“17. The 2015 Act came into force on 15-1-2016. Section 111 repeals the earlier the 2000 Act but stipulates that despite the repeal, anything done or any action taken under the said Acts shall be deemed to have been done or taken under the corresponding provisions of the new legislation. Section 94 contains provisions in regard to the determination of age, is in the following terms:

“94. Presumption and determination of age.—(1) Where, it is obvious to the Committee or the Board, based on the appearance of the person brought before it under any of the provisions of this Act (other than for the purpose of giving evidence) that the said person is a child, the Committee or the Board shall record such observation stating the age of the child as nearly as may be and proceed with the inquiry under Section 14 or Section 36, as the case may be, without waiting for further confirmation of the age.

(2) In case, the Committee or the Board has reasonable grounds for doubt regarding whether the person brought before it is a child or not, the Committee or the Board, as the case may be, shall undertake the process of age determination, by seeking evidence by obtaining—

(i) the date of birth certificate from the school, or the matriculation or equivalent certificate from the Examination Board concerned, if available; and in the absence thereof;

(ii) the birth certificate given by a corporation or a municipal authority or a panchayat;

(iii) and only in the absence of (i) and (ii) above, age shall be determined by an ossification test or any other latest medical age determination test conducted on the orders of the Committee or the Board:

Provided such age determination test conducted on the order of the Committee or the Board shall be completed within fifteen days from the date of such order.

(3) The age recorded by the Committee or the Board to be the age of person so brought before it shall, for the purpose of this Act, be deemed to be the true age of that person.”

Clause (i) of Section 94(2) places the date of birth certificate from the school and the matriculation or equivalent certificate from the Examination Board concerned in the same category [namely (i) above]. In the absence thereof category (ii) provides for obtaining the birth certificate of the corporation, municipal authority or panchayat. It is only in the absence of (i) and (ii) that age determination by means of medical analysis is provided. Section 94(2)(i) indicates a significant change over the provisions which were contained in Rule 12(3)(a) of the 2007 Rules made under the 2000 Act. Under Rule 12(3)(a)(i) the matriculation or equivalent certificate was given precedence and it was only in the event of the certificate not being available that the date of birth certificate from the school first attended, could be obtained. In Section 94(2)(i) both the date of birth certificate from the school as well as the matriculation or equivalent certificate are placed in the same category.”

(Emphasis supplied)

9. In the background of above legal position, matriculation certificate or birth certificate issued from School would be considered to be best evidence to determine date of birth of a person and in the present case according to certificate of matriculation date of birth of Petitioner-2 is 04.05.1999. Therefore, the findings returned by all the three authorities that on the basis of birth date, Petitioner-2 cannot be considered to be the daughter born out of wedlock of Petitioner-1 and Shakeel, since admittedly he died on 27.07.1997, i.e., about one year, 08 months and 07 days before Petitioner-2 was born, cannot be considered to be perverse. Nothing has been brought on record that date of birth mentioned in the document available at School was different. Merely that name of Shakeel was mentioned as father in certificate would not contradict medical opinion that considering gap of 615 days between death of Shakeel and date of birth of Petitioner-2, he could not be her father.

10. Second argument of learned counsel for petitioners is with regard to determination of parentage by conducting DNA test that and this Court may pass appropriate direction in this regard. In this regard it would be apposite to extract relevant paragraph of a judgment passed by Supreme Court in Aparna Ajinkya Firodia v. Ajinkya Arun Firodia, 2023 SCC OnLine SC 161 as under:

“60. Having regard to the aforesaid discussion, the following principles could be culled out as to the circumstances under which a DNA test of a minor child may be directed to be conducted:

i. That a DNA test of a minor child is not to be ordered routinely, in matrimonial disputes. Proof by way of DNA profiling is to be directed in matrimonial disputes involving allegations of infidelity, only in matters where there is no other mode of proving such assertions.

ii. DNA tests of children born during the subsistence of a valid marriage may be directed, only when there is sufficient prima-facie material to dislodge the presumption under Section 112 of the Evidence Act. Further, if no plea has been raised as to non-access, in order to rebut the presumption under Section 112 of the Evidence Act, a DNA test may not be directed.

iii. A Court would not be justified in mechanically directing a DNA test of a child, in a case where the paternity of a child is not directly in issue, but is merely collateral to the proceeding.

iv. Merely because either of the parties have disputed a factum of paternity, it does not mean that the Court should direct DNA test or such other test to resolve the controversy. The parties should be directed to lead evidence to prove or disprove the factum of paternity and only if the Court finds it impossible to draw an inference based on such evidence, or the controversy in issue cannot be resolved without DNA test, it may direct DNA test and not otherwise. In other words, only in exceptional and deserving cases, where such a test becomes indispensable to resolve the controversy the Court can direct such test.

v. While directing DNA tests as a means to prove adultery, the Court is to be mindful of the consequences thereof on the children born out of adultery, including inheritance-related consequences, social stigma, etc.”

11. As held in Aparna Ajinkya Firodia (supra) order to conduct DNA test could not be passed in a routine manner and it has to be passed only in extraordinary circumstances when there is no other legal basis to determine parentage of person concerned and since in the present case there is a document which is recognized to be sufficient legal proof of determination of date of birth, i.e., matriculation certificate, therefore, no circumstance exist to pass an order for DNA test.

12. The submission of learned counsel appearing for contesting-respondents that even in view of Section 171 of Act of 1950 petitioners have no right to claim ownership on property of Shakeel since Petitioner-1 has admittedly remarried, has legal force and this argument has not been seriously disputed by learned counsel for petitioners, therefore, this issue also held against petitioners. Accordingly any challenge to “Will” at behest of petitioners has also no basis. A factor that Petitioner-2 (now major) has independently never taken any step to claim her right, if any, over land in dispute, also held to be against the petitioners.

13. In view of above discussion, I find no illegality or irregularity in impugned orders warranting interference under Article 226 of Consolidation of India. Writ petition is accordingly dismissed.

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